एक अधूरी सी दास्तान
शहर के एक कोने में स्थित पुरानी लाइब्रेरी, जहां शांत माहौल और किताबों की खुशबू हर दिल को सुकून देती थी। वहीं अक्सर बैठने वाला एक लड़का था आरव। अपनी किताबों और कविताओं में खोया रहता। उसकी दुनिया उसकी कल्पनाओं में थी।
एक दिन, लाइब्रेरी में एक नई लड़की आई। नाम था तान्या। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक और चेहरे पर मासूमियत थी। उसने एक कोने में बैठकर अपनी किताबें पढ़नी शुरू कीं। आरव की नजर बार-बार उस पर पड़ती। तान्या की सादगी और उसकी किताबों में डूबी आंखों ने आरव को खींच लिया।
एक दिन हिम्मत जुटाकर आरव ने तान्या से कहा, "आपकी किताब का नाम जान सकता हूं?"
तान्या मुस्कुराई और जवाब दिया, "प्यार की कहानियां। शायद आपकी जैसी।"
आरव हंस पड़ा, लेकिन उसके दिल में तान्या के लिए एक अनजाना एहसास जगने लगा। धीरे-धीरे दोनों की बातें बढ़ने लगीं। हर शाम लाइब्रेरी में मिलने का सिलसिला शुरू हुआ। आरव तान्या के लिए कविताएं लिखता, और तान्या उसे अपने सपने बताती।
एक दिन तान्या ने कहा, "आरव, मैं यहां कुछ समय के लिए आई हूं। मेरी पढ़ाई खत्म होते ही मैं इस शहर को छोड़ दूंगी।"
आरव का दिल धड़क उठा। उसने तान्या से कुछ नहीं कहा, लेकिन उसकी कविताओं में दर्द झलकने लगा।
तान्या की विदाई का दिन करीब आ गया। आरव ने उसे अपनी लिखी एक किताब गिफ्ट की, जिसका नाम था "तान्या: मेरी कविता"। तान्या की आंखें भर आईं। उसने आरव को गले लगाया और कहा, "तुम्हारी कविताएं हमेशा मेरे साथ रहेंगी।"
तान्या चली गई, लेकिन आरव की कविताओं में उसका अक्स हमेशा जिंदा रहा। लाइब्रेरी के उस कोने में बैठा आरव आज भी अपनी अधूरी दास्तान लिखता है। उसकी कविताएं तान्या के इंतजार में बस एक वादा करती हैं –
"प्यार अधूरा हो सकता है, लेकिन उसकी यादें हमेशा पूरी रहती हैं।"
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