घर मुझमें घर ढूंढ रहा है, मैं घर में घर ढूंढ रहा हूँ.
मेरी प्यास मुझे भी देखो किस मुक़ाम पर ले आई है,
मैं रेतीले टीलों में भी सात समंदर ढूंढ रहा हूँ.
सारी-सारी रात जाग कर मैं रिश्तों के महानगर में,
ऊँची हर मीनार के नीचे नींव के पत्थर ढूंढ रहा हूँ.
उड़ता तो हो मगर किसी को नज़र नहीं जो आ पाता हो,
मैं ख़त भिजवाने को ऐसा एक कबूतर ढूंढ रहा हूँ.
ये कैसी अंधी तलाश है जो अब ख़त्म नहीं होती है,
गुज़रे हर लम्हे को अपनी झोली भर कर ढूंढ रहा हूँ.
इक ख़ामोश झील के दिल में जो हलचल होंठों से लिख दे,
सदियों से मैं झील किनारे ऐसे कंकर ढूंढ रहा हूँ.
अहसासों के जिस जंगल में चारों ओर आग फैली हो,
उसमें फिर से मैं रिश्तों के क्यों गुलमोहर ढूंढ रहा हूँ.
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