नज़रों ने जितने दिखलाए सारे मंज़र रख आया हूँ

नज़रों ने जितने दिखलाए सारे मंज़र रख आया हूँ,
मैं उसके दरवाज़े पर इक मिट्टी का घर रख आया हूँ.
इक ख़ामोश झील की चुप्पी नहीं तोड़ पाया हूँ लेकिन,
मैं उसके तट पर यादों के नन्हे कंकर रख आया हूँ.
सिर्फ़ यही एहसास मुझे क्यों हर पल तंग किया करता है.
जैसे किसी जिस्म के अन्दर मैं इक ख़ंजर रख आया हूँ.
साथ-साथ उड़ने के सपने तुमने मुझको जहाँ दिखाए,
नोंचे हुए पंख मैं अपने उसी जगह पर रख आया हूँ.
उसकी मांगी किसी दुआ में मेरी चाहत भी शामिल हो,
यही सोच उसके सजदे में मैं अपना सर रख आया हूँ.
जितना मैं भूलूंगा उसको उतना ही वो याद करेगा,
मैं उसके झोले में ऐसे जादू-मंतर रख आया हूँ.
जितने भी मरुथल रिश्तों के मुझको मिले रास्ते चलते,
सबके आगे बादल, दरिया और समंदर रख आया हूँ.

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